Indian Defence deal: फ्रांस से 114 राफेल डील या रूस से 225 SU-57, फ्रांस से डील का मतलब रणनीतिक निर्भरता भी बढ़ेगी, स्वदेशी हथियारों और सॉफ्टवेयर के लिए डसॉल्ट पर निर्भर रहेगा, सोर्स कोड और रडार नियंत्रण न मिलने से ऑपरेशनल आज़ादी सीमित हो सकती है। वहीं रूस के इस डील में भारत को 100% सोर्स मिलेगा यानि आत्मनिर्भर भारत!
![]() |
| भारत के लिए कौन रहेगा बेहतर राफेल या सुखोई SU-57 फाइटर जेट। |
News Subah Ki: भारत के लिए कौन सा डील होगा सबसे बेहतर? भारत बहुत जल्द दशक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा करने जा रहा है। मगर भारत के सामने इस रक्षा सौदे में एक दुविधा है कि वो फ्रांस से डील करे या रूस से क्योंकि भारत अपनी हवाई शक्ति बढ़ाने के लिए 114 राफेल फाइटर जेट खरीदे या उसी कीमत 225 सुखोई SU-57 5th जेनरेशन फाइटर जेट खरीदे। हालांकि भारत के फ्रांस से डील का मतलब हवाई ताकत के साथ ही अपने लिए एक डिजिटल जंजीर भी खरीद रहा है। इतनी बड़ी डील में इस तरह की रणनीतिक चूक को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। इंडियन पॉलिसी मेकर्स को राफेल जेट का प्रोग्राम यह कहकर बेचा गया कि इससे एयर पावर में जबरदस्त उछाल आएगा। इसमें भारत अपने स्वदेशी हथियारों को आसानी से फिट कर सकता है। लेकिन दावे हकीकत से परे नजर आ रहे हैं।
राफेल डील पर उपलब्ध जानकारियों से पता चलता है कि भारत सीधे एक ऐसे डसॉल्ट-नियंत्रित बंद इकोसिस्टम में फंस गया है, जो बाहर से भले ही अत्याधुनिक दिखता हो, लेकिन अंदर से पूरी तरह लॉक है। वहीं रूस से डील करता है तो उसी कीमत में भारत को राफेल से दुगना सुखोई SU- 57 5th जेन फाइटर जेट मिलेंगे और वो भी 100% सोर्स कोड के साथ जिसमे भारत अपने हिसाब से स्वदेशी रडार और हथियारों को आसानी से फिट कर सकता है। जिससे आत्मनिर्भर भारत प्रोग्राम को बहुत ज्यादा ताकत प्रदान करेगा। जिससे भारतीय वायुसेना (IAF) की हवाई ताकत बढ़ेगी। परन्तु 100% सोर्स कोड नहीं मिलने से जिस प्रकार एप्पल कंपनी का आई फोन होता है। यानी इसमें कुछ नया नहीं कर सकते हैं। अगर आप कुछ बदलाव चाहते हैं तो एप्पल के पास ही जाना होगा।
Highlights
✅ भारत अपनी हवाई शक्ति बढ़ाने के लिए 114 राफेल फाइटर जेट खरीदे या उसी कीमत 225 सुखोई SU-57 5th जेनरेशन फाइटर जेट खरीदे?
✅ भारत के फ्रांस से डील का मतलब हवाई ताकत के साथ ही अपने लिए एक डिजिटल जंजीर भी खरीद रहा है।
✅ रूस से डील करता है तो उसी कीमत में भारत को राफेल से दुगना सुखोई SU- 57 5th जेन फाइटर जेट मिलेंगे।
✅ राफेल में आसान इंटीग्रेशन एक मीठा झुनझुना साबित होता हुआ दिख रहा है। जिसे सैद्धांतिक रूप से एक ओपन-आर्किटेक्चर मल्टीरोल फाइटर बताया गया था।
✅ भारत ने शुरुआत में ही स्वदेशी AESA रडार पर जोर नहीं दिया और थेल्स के फ्रेंच रडार को स्वीकार कर लिया।
प्रीमियम फाइटर जेट के साथ एक प्रीमियम चूक:
राफेल एक ऐसा प्रीमियम फाइटर जेट बन गया है, जिसे भारत उड़ा तो सकता है, लेकिन वाकई अपना नहीं बना सकता है। भारत को न सोर्स कोड मिल रहा है और न ही मिशन सिस्टम पर नियंत्रण, ऊपर से पूरी तरह प्रोप्रायटरी थेल्स AESA रडार पर है। वहीं रूस के सुखोई SU-57 के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि रूसी कंपनी ने पहले ही 100% सोर्स कोड देने का वादा किया था। राफेल में आसान इंटीग्रेशन एक मीठा झुनझुना साबित होता हुआ दिख रहा है। राफेल को सैद्धांतिक रूप से एक ओपन-आर्किटेक्चर मल्टीरोल फाइटर बताया गया था, जो हर तरह के हथियारों को आसानी से अपना सकता है, लेकिन असलियत यह है, कि हर नया हथियार, हर नया सेंसर और हर सॉफ्टवेयर बदलाव डसॉल्ट की मंजूरी से ही संभव है। वहीं रूस के सुखोई SU-57 5th जेन फाइटर जेट के साथ ऐसा नहीं है, इसमें भारत अपनी मर्जी से कुछ भी कर सकता है। इसमें रूसी कंपनी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट (Rosoboronexport) के मंजूरी की सवाल ही नहीं है।
![]() |
| भारत के लिए कौन रहेगा बेहतर राफेल या सुखोई SU-57 फाइटर जेट। |
भारत का राफेल पर ज्यादा कंट्रोल रहेगा या सुखोई SU-57 पर:
राफेल की अहम चीजों पर डसॉल्ट का ही कंट्रोल रहेगा। जिसमें मिशन कंप्यूटर का पूरा नियंत्रण, फ्लाइट कंट्रोल लॉजिक्स, रडार इंटरफेस और सबसे अहम सोर्स कोड है। भारत चाहे कितनी भी उन्नत मिसाइल बना ले, उसे राफेल में जोड़ने के लिए डसॉल्ट की अनुमति, इंजीनियरिंग मेहनत और मोटा भुगतान करना ही पड़ेगा। वहीं सुखोई SU-57 फाइटर जेट की बात की जाए तो इसका बात ही कुछ अलग है। क्योंकि रूसी कंपनी रोसोबोरोनएक्सपोर्ट (Rosoboronexport) ने पहले ही साफ-साफ कह दिया है, कि वो भारतीय वायुसेना के हिसाब से सारा बदलाव 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) के तहत करेगा।
संबंधित खबरें
सुखोई SU-57 के अपेक्षा, डसॉल्ट के राफेल का काला सच:
अस्त्र मार्क-1 और रुद्रम-I दोनों को राफेल के लिए India-Specific Upgrades बताया गया है। यही शब्द अपने आप में सब कुछ कह देते हैं। ये राफेल की मूल क्षमताएं नहीं हैं, बल्कि कस्टम बदलाव हैं। इन बदलावों के लिए डसॉल्ट को सॉफ्टवेयर दोबारा लिखना पड़ता है। इंटरफेस बदलने पड़ते हैं। इसके अलावा फ्लाइट ट्रायल करने होते हैं। साथ ही सेफ्टी और कॉम्बैट सर्टिफिकेशन देना होता है। हर स्टेप के साथ बिल जुड़ा होता है। आज भी राफेल पर अस्त्र का ऑपरेशनल इंटीग्रेशन अधूरा है और रुद्रम-I अभी भी इंतजार में है। यह भारतीय मिसाइलों की कमजोरी नहीं है, बल्कि उस प्लेटफॉर्म की सच्चाई है, जहां डिजिटल कंट्रोल OEM के हाथ में हो।
डसॉल्ट का राफेल के साथ असली चूक रडार को लेकर हुई:
सबसे बड़ी गलती वहीं हुई, जब भारत ने शुरुआत में ही स्वदेशी AESA रडार पर जोर नहीं दिया और थेल्स के फ्रेंच रडार को स्वीकार कर लिया। आधुनिक हवाई युद्ध में रडार सिर्फ सेंसर नहीं होता। रडार टारगेटिंग तय करता है, डेटा फ्यूजन संभालता है, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को कंट्रोल करता है और वही हथियार चलाने की पूरी कड़ी तय करता है। जिसके हाथ में रडार सॉफ्टवेयर है, उसके हाथ में किल-चेन है। बिना सोर्स कोड और बिना भारतीय रडार के भारत हर अपग्रेड के लिए डसॉल्ट पर निर्भर रहेगा।
भारत जहां तेजस मार्क-II, AMCA और भविष्य के विमानों में भारतीय रडार, भारतीय हथियार और भारतीय मिशन कंप्यूटर मिलकर एक साझा आर्किटेक्चर बनाते हैं। वहीं भारत ने अपनी सबसे महंगी फाइटर फ्लीट को विदेशी डिजिटल किले के अंदर बंद कर दिया है। इसका नतीजा यह होगा कि भले ही राफेल भारत में बने, लेकिन उसका दिमाग और नर्वस सिस्टम फ्रांस के हाथ में रहेगा।
Disclaimer: यह लेख सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित है। News Subah Ki ने पोस्ट में किए गए दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है, और न ही उनकी सटीकता की गारंटी देता है। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक रूप से News Subah Ki के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं। पाठक विवेक का प्रयोग करें।


Post a Comment