India's deal with Russia for SU-57E fighter aircraft: वायुसेना अपनी घटती स्क्वॉड्रन संख्या को नई ताकत देने के लिए रूस से बड़ी संख्या में पांचवीं पीढ़ी (5th Gen) के लड़ाकू विमान खरीदने वाली है। यह स्टेल्थ टेक्नोलॉजी वाला सुखोई SU-57E लड़ाकू विमान होगा। रूस ने इस डील को और भी आकर्षक बनाने के लिए इन लड़ाकू विमानों में दुनिया के सबसे खतरनाक किंझल हाइपरसोनिक मिसाइल को इंटीग्रेट करने का ऑफर दिया है।
![]() |
| किंझल हाइपरसोनिक मिसाइल से लैस, भारतीय सुखोई SU-57E स्टील्थ लड़ाकू विमान। |
News Subah Ki: भारतीय वायु सेना (IAF) से MiG-21 के रिटायर होने के बाद एयरफोर्स अपनी लड़ाकू स्क्वॉड्रन की संख्या को फिर से बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक कदम उठा रही है। स्वीकृत 42 स्क्वॉड्रन के मुकाबले वर्तमान में 29 स्क्वॉड्रन होने के कारण पैदा हुए अंतर को भरने के लिए भारतीय वायुसेना (IAF) ने तगड़ी प्लानिंग बनाई है। इसी प्लान के तहत, भारतीय वायुसेना (IAF) रूस से करीब 63 सुखोई SU-57E स्टील्थ लड़ाकू विमान (तीन स्क्वॉड्रन के बराबर) खरीदने पर विचार कर रही है।
इस खरीद के साथ सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि रूसी प्रतिनिधियों ने इस सौदे को अंतिम रूप देने के लिए एक बड़ा लुभावना ऑफर भारत को दिया है। सुखोई SU-57E लड़ाकू विमानों में किंझल (Kinzhal) जैसी हाइपरसोनिक हवा से लॉन्च होने वाली बैलिस्टिक मिसाइल (ALBM) को इंटीग्रेट करने का है। इससे भारत दुश्मनो के इलाको में बिना घुसे ही दूर से ही दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने की ताकत मिलेगी।
Highlights
✅ 42 स्क्वॉड्रन के मुकाबले वर्तमान में 29 स्क्वॉड्रन होने के कारण पैदा हुए अंतर को भरने के लिए भारतीय वायुसेना की तगड़ी प्लानिंग।
✅ रूस का भारत को बड़ा लुभावना ऑफर! सुखोई SU-57E लड़ाकू विमानों को किंझल हाइपरसोनिक मिसाइलों से लैस करके देगा।
✅ भारत रूस से करीब 63 सुखोई SU-57E लड़ाकू विमानों की खरीद पर विचार कर रहा है।
✅ यह 63 लड़ाकू विमानों का डील, जिसका कुल मूल्य लगभग ₹44,384 करोड़ से ₹53,362 करोड़ रुपए तक होगा।
✅ इसके साथ ही भारत का फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की डील भी फाइनल स्टेज पर पहुंच गया हैं।
![]() |
| किंझल हाइपरसोनिक मिसाइल से लैस, भारतीय सुखोई SU-57E स्टील्थ लड़ाकू विमान। |
भारतीय वायुसेना सुखोई SU-57E को ही क्यों चुन रही ?
भारतीय वायुसेना (IAF) अपनी वायु रक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए फ्रांस से 114 राफेल फाइटर जेट और रूस से करीब 63 सुखोई SU-57E लड़ाकू विमानों की खरीद पर विचार कर रही है, जो तेजस की उत्पादन लाइन को भी सहारा देगा।
साथ ही, MiG-21 लड़ाकू विमानों के सेवानिवृत्त होने और स्वदेशी प्रोजेक्ट एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) में देरी के कारण भारतीय वायुसेना (IAF) को स्क्वॉड्रन की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में, सुखोई SU-57E लड़ाकू विमान को 2035 में आने वाले AMCA के लिए एक अंतरिम समाधान के रूप में काम करेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, रूस से लिए जा रहे 63 सुखोई SU-57E लड़ाकू विमानों से तीन समर्पित स्क्वॉड्रन तैयार होंगी, जिन्हें पंजाब के अंबाला या पश्चिम बंगाल के हासीमारा जैसे फ्रंटलाइन हवाई अड्डों पर तैनात किया जा सकता है।
संबंधित खबरें
4. यूनाइटेड एविएशन कोऑपरेशन (UAC) ने आधिकारिक तौर पर भारत को SU-57 के सह-उत्पादन के पुष्टि की
सुखोई SU-57E को लेकर हाइपरसोनिक किंझल का दांव:
![]() |
| किंझल हाइपरसोनिक मिसाइल से लैस, भारतीय सुखोई SU-57E स्टील्थ लड़ाकू विमान। |
वहीं, यह लॉन्च होने के बाद, यह अप्रत्याशित बैलिस्टिक मिसाइल प्रक्रिया का पालन करती है, जिससे पाकिस्तानी या चीनी रक्षा प्रणालियों (Defence System) के लिए इसे रोकना लगभग असंभव हो जाएगा। इसके इधर, सुखोई SU-57E लड़ाकू विमान के आंतरिक बे से लॉन्च किए जाने पर, यह मिसाइल भारतीय हवाई क्षेत्र से ही दुश्मन देशों के भीतरी क्षेत्रों के लक्ष्यों पर हमला कर सकती है।
ये भी पढ़ें: चीन के सबसे बड़े दुश्मन ताइवान ने भारत को दिया ऐसा ऑफर, की पूरे एशिया के जियोपोलिटिक्स में हलचल मचा दी?
4.5 पीढ़ी के राफेल से भी सस्ता पांचवीं पीढ़ी का SU-57E :
इस समझौते में हिंदुस्तान एरोनॉटिक लिमिटेड (HAL) की नासिक फैसिलिटी का इस्तेमाल सुखोई SU-57E के स्थानीय असेंबली के लिए करने का प्रस्ताव है, जो पूर्व में सुखोई SU-30MKI के लिए इस्तेमाल किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, पहले चरण में 36 से 40 लड़ाकू विमान (दो स्क्वॉड्रन) का आयात 2028 तक हो सकता है, जबकि बाकी लड़ाकू विमान 2032 तक भारतीय लाइनों से तैयार होंगे।
बता दें, इस परियोजना में 70% स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल का लक्ष्य रखा गया है, जिससे लागत कम होगी और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (ToT) भी संभव होगा। वहीं, अनुमानित लागत प्रति यूनिट $80 से $100 मिलियन डॉलर हो सकती है, जिसका कुल मूल्य लगभग $5 से $6 बिलियन डॉलर (₹44,384 से ₹53,362 करोड़ रुपए) होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के कारण यह पश्चिमी विकल्पों की तुलना में अधिक व्यवहारिक है।
Disclaimer: यह लेख सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित है। News Subah Ki ने पोस्ट में किए गए दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है, और न ही उनकी सटीकता की गारंटी देता है। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक रूप से News Subah Ki के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं। पाठक विवेक का प्रयोग करें।



Post a Comment